भारत में आरक्षण का इतिहास: 144 साल की टाइमलाइन (OBC 27%)

आरक्षण का इतिहास भारत में सामाजिक न्याय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है। भारत में आरक्षण की शुरुआत आज़ादी से पहले हुई थी और समय के साथ SC, ST, OBC और EWS वर्गों के लिए इसमें बदलाव होते रहे

आरक्षण क्या है?

आरक्षण एक ऐसी व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य समाज के हाशिये पर रहने वाले और पिछड़े वर्गों को समान अवसर देना है। सामाजिक अन्याय और भेदभाव से बचाने के लिए आरक्षण के माध्यम से उनके लिए कुछ सीटें/स्थान सुरक्षित किए जाते हैं।

यह व्यवस्था खासतौर पर शिक्षा और सरकारी नौकरियों में वंचित वर्गों को आगे बढ़ाने में मदद करती है। आरक्षण की शुरुआत ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने और समाज में बराबरी लाने के लिए की गई थी।

आरक्षण का मुख्य काम यह सुनिश्चित करना है कि समाज के सबसे कमजोर और पिछड़े वर्गों को भी इसका लाभ मिले और सभी को बिना किसी भेदभाव के समान मंच और अवसर मिल सके।

Read More आरक्षण के बारे में

आरक्षण का इतिहास कब शुरू हुआ?

भारत में आरक्षण व्यवस्था की शुरुआत आज़ादी से कई साल पहले ही हो चुकी थी। कहा जाता है कि आज से लगभग 144 साल पहले और आज़ादी से करीब 68 साल पहले भारत में आरक्षण की नींव रखी गई थी।

19वीं सदी के महान भारतीय विचारक, समाजसेवी और लेखक ज्योतिराव गोविंदराव फुले ने समाज में समानता लाने के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की मांग की थी। इसके साथ ही उन्होंने सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण (प्रतिनिधित्व) की भी बात उठाई थी।

उनका मानना था कि शिक्षा और नौकरी में बराबरी के अवसर मिलने से समाज के पिछड़े और वंचित वर्ग भी आगे बढ़ सकते हैं।

1882 से 2019 तक आरक्षण का इतिहास

1882 में हंटर आयोग

हंटर आयोग 1882 (Hunter Commission 1882) भारत में शिक्षा व्यवस्था, खासकर प्राथमिक शिक्षा में सुधार और 1854 के वुड डिस्पैच की समीक्षा के लिए बनाया गया था। यह भारत का पहला भारतीय शिक्षा आयोग था, जिसे लॉर्ड रिपन ने सर विलियम विल्सन हंटर की अध्यक्षता में गठित किया। इस आयोग ने शिक्षा के विकेंद्रीकरण, महिला शिक्षा को बढ़ावा देने और प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर पर सुधारों की सिफारिश की थी।

सन 1880 में लॉर्ड रिपन को भारत का गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया था। इसके बाद उन्होंने भारतीय शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए 1882 में एक कमीशन बनाया, जिसे “भारतीय शिक्षा आयोग” कहा गया। चूंकि यह आयोग विलियम हंटर की अध्यक्षता में बना था, इसलिए इसे हंटर कमीशन के नाम से जाना गया।

आयोग की सिफारिशों के बाद 1882 में पंजाब विश्वविद्यालय और 1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

Read More हंटर आयोग के बारे में

1891 में त्रावणकोर आंदोलन

1891 में केरल की त्रावणकोर रियासत में सरकारी सेवाओं में योग्य मूल निवासियों की अनदेखी कर बाहरी लोगों को भर्ती किए जाने के विरोध में आंदोलन हुआ था। इसी प्रदर्शन के साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग भी उठी। त्रावणकोर में गैर-स्थानीय लोगों, विशेष रूप से तमिल ब्राह्मणों की सार्वजनिक सेवा में भर्ती के खिलाफ आवाज़ उठी, क्योंकि इससे योग्य स्थानीय लोगों को अवसर नहीं मिल पा रहा था।

1901 में शाहू महाराज का फैसला

1901 में महाराष्ट्र की कोल्हापुर रियासत में शाहू महाराज ने आरक्षण की शुरुआत की। उन्होंने समाज के वंचित वर्गों को समान अवसर दिलाने के लिए प्रयास किए और सरकारी नौकरियों में उनके लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू की। माना जाता है कि आरक्षण से जुड़ा यह भारत का पहला सरकारी आदेश था।

1908 में अंग्रेजों ने भी प्रशासन में कम हिस्सेदारी वाली जातियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए और कुछ हद तक आरक्षण जैसी व्यवस्था लागू की गई, ताकि प्रशासन में उनका हिस्सा तय किया जा सके।

1909 में भारत सरकार अधिनियम 1909 और बाद में 1919 के अधिनियम में भी आरक्षण से जुड़े प्रावधान किए गए और समय-समय पर उनमें बदलाव किए गए। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने अलग-अलग धर्म और जातियों के लिए कम्यूनल अवार्ड की भी शुरुआत की।

1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी का आदेश

1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने आरक्षण से जुड़ा जातिगत सरकारी आदेश जारी किया। इसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए 8 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था तय की गई थी।

1932 का पूना पैक्ट

1932 में पूणे की यरवदा सेंट्रल जेल में 24 सितंबर 1932 को बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ, जिसे पूना पैक्ट कहा जाता है। इस समझौते के तहत प्रांतीय और केंद्रीय विधान परिषदों में वंचित वर्गों के लिए सीटों की गारंटी दी गई, जिन्हें जनता द्वारा चुना जाना था। ब्रिटिश सरकार ने कुछ सीटें वंचित वर्गों के लिए आरक्षित की थीं। पहले ‘अछूत’ माने जाने वाले वर्गों को दो वोट का अधिकार मिलने की बात थी, लेकिन गांधी जी के विरोध के बाद पूना पैक्ट के रूप में समझौता हुआ।

1942 में डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन में अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की। उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग को मजबूत किया।

1946 में भारत में कैबिनेट मिशन ने अन्य कई सिफारिशों के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व का भी प्रस्ताव दिया।

1947 में भारत को आज़ादी मिलने के बाद SC, ST और OBC वर्गों के लिए कई अहम फैसले लिए गए और आरक्षण व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया।

1953 में कालेलकर आयोग

1953 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग की स्थापना की गई। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर अनुसूचियों में संशोधन किए गए।

1979 में मंडल आयोग

1979 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति का आकलन करने के लिए मंडल आयोग का गठन किया गया। 1980 में आयोग ने रिपोर्ट पेश की और मौजूदा कोटा में बदलाव करते हुए आरक्षण को 22 प्रतिशत से बढ़ाकर 49.5 प्रतिशत तक करने की सिफारिश की।

1990-91 में मंडल आयोग की सिफारिशों को प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया। इसका देशभर में भारी विरोध हुआ। बाद में 1991 में नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों के गरीब वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण शुरू किया। इसके बाद से आरक्षण से जुड़े नियमों में समय-समय पर लगातार बदलाव होते रहे हैं।

2006 में OBC आरक्षण शिक्षा संस्थानों में

2006 में केंद्रीय उच्च शिक्षा संस्थानों जैसे IIT, IIM और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में OBC वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया।

Read mre बेटों ने मां-बाप को वृद्धाश्रम भेजा, मौत के बाद भी नहीं लिया शव: गोरखपुर में ‘बागवान’ जैसी घटना

2019 में EWS (Economically Weaker Section) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ, जो सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए था। यह 103वां संविधान संशोधन माना जाता है।

भारत में कुल आरक्षण कितना है?

भारत में केंद्र सरकार की नौकरियों और कई संस्थानों में अलग-अलग वर्गों के लिए आरक्षण तय किया गया है। इसमें SC, ST, OBC (Non-Creamy Layer) और EWS वर्ग शामिल हैं। नीचे इसका पूरा विवरण दिया गया है—

वर्ग (Category)आरक्षण प्रतिशत (Reservation %)
SC (Scheduled Caste)15%
ST (Scheduled Tribe)7.5%
OBC (Non-Creamy Layer)27%
EWS (General गरीब वर्ग)10%

Total Reservation (कुल आरक्षण)

15 + 7.5 + 27 + 10 = 59.5%

यानि केंद्र सरकार की नौकरियों और कई संस्थानों में कुल 59.5% आरक्षण लागू है।

SC, ST, OBC और EWS का मतलब

SC (Scheduled Caste)
भारत सरकार ने कुछ जातियों को इतिहास में भेदभाव और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण एक सरकारी सूची (Schedule) में शामिल किया है। इन्हीं जातियों को Scheduled Caste (SC) कहा जाता है।

ST (Scheduled Tribe)
भारत में कुछ समुदाय/जनजातियाँ जो पहाड़ों, जंगलों, दूर-दराज़ इलाकों में रहती हैं और जिनका सामाजिक-आर्थिक विकास कम रहा है, उन्हें सरकार ने एक सूची (Schedule) में शामिल किया है। इन्हें ही Scheduled Tribe (ST) कहा जाता है।

OBC (Other Backward Classes)
OBC (Other Backward Classes) वे वर्ग हैं जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े माने जाते हैं। इसमें “Creamy Layer” का नियम लागू होता है।

Creamy Layer क्या होता है?
OBC में वे लोग जो आर्थिक/सामाजिक रूप से काफी मजबूत हो चुके हैं, उन्हें Creamy Layer कहा जाता है। ऐसे OBC लोगों को आरक्षण नहीं मिलता। OBC में आमतौर पर “गरीब/मध्यम वर्ग” को आरक्षण मिलता है, अमीर या उच्च पद वालों को नहीं।

Non-Creamy Layer (NCL) क्या है?
यानि OBC का वो हिस्सा जो Creamy Layer में नहीं आता। OBC Reservation (27%) सिर्फ NCL को ही मिलता है।

EWS क्या होता है?
EWS = Economically Weaker Section। यह General Category (जिनके पास SC/ST/OBC आरक्षण नहीं है) के गरीब लोगों के लिए है। EWS में 10% आरक्षण मिलता है।

लोकसभा और विधानसभा में आरक्षण

लोकसभा (Parliament – Lok Sabha) में SC/ST आरक्षण

भारत की लोकसभा में कुल 543 सीटें होती हैं। इनमें से कुल 131 सीटें SC/ST के लिए आरक्षित हैं।

सीटों का प्रकारसीटों की संख्या
SC (अनुसूचित जाति)84
ST (अनुसूचित जनजाति)47
कुल आरक्षित (SC+ST)131
सामान्य/अनारक्षित सीटें412
कुल सीटें543

राज्य विधानसभाओं (MLA) में SC/ST आरक्षण

राज्य विधानसभाओं में भी SC और ST के लिए सीटें आरक्षित होती हैं। यह आरक्षण राज्य की जनसंख्या के अनुपात के अनुसार तय किया जाता है—जैसे जिस राज्य में SC आबादी ज्यादा होगी, वहाँ SC के लिए सीटें भी ज्यादा आरक्षित होंगी।

विषयजानकारी
आरक्षण किसके लिए?SC और ST
सीटें कैसे तय होती हैं?जनसंख्या के अनुपात के अनुसार
उदाहरणSC आबादी ज्यादा → SC सीटें ज्यादा
संवैधानिक प्रावधानअनुच्छेद 332