1 करोड़ Ex-Muslim का दावा: केरल से उठी आवाज़, ईरान आंदोलन से मिला बल
Ex-Muslim Movement भारत और ईरान में एक नया सामाजिक बदलाव बनकर उभर रहा है। लोग धार्मिक कठोरता पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, दोनों देशों में इसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग है।
ईरान में मौजूदा सरकार के विरुद्ध चल रहे आंदोलनों ने वहां ‘एक्स-मुस्लिम’ (पूर्व मुस्लिम) विमर्श को भी नई गति दी है। महंगाई और सामाजिक प्रतिबंधों के विरोध से शुरू हुए ये आंदोलन अब इस्लामी पहचान पर सवाल उठाने तक पहुंच गए हैं। ईरान में कई लोग इस्लाम को ‘बाहरी प्रभाव’ मानते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को प्राचीन पारसी धर्म से जोड़कर देखने लगे हैं। इसी प्रकार भारत में भी कुछ एक्स-मुस्लिम अपनी पहचान को सनातन परंपरा से जोड़ते हुए समानताएं देख रहे हैं।
हालांकि दोनों देशों की परिस्थितियों में एक बड़ा अंतर यह है कि ईरान में इस्लाम के प्रति असहमति अब खुलकर व्यक्त की जा रही है, जबकि भारत में यह विमर्श अभी भी मुख्यतः इंटरनेट मीडिया—जैसे एक्स (पूर्व में ट्विटर), यूट्यूब, फेसबुक और व्हाट्सऐप—तक सीमित है। भारत में खुलकर सामने आने पर पारिवारिक दबाव और सामाजिक प्रतिक्रिया का भय बना रहता है। इसके बावजूद कुछ एक्स-मुस्लिम अब सार्वजनिक मंचों पर सामने आने का साहस दिखा रहे हैं।
भारत में Ex-Muslim Movement
भारत में Ex-Muslim Movement परिवार और समाज के दबाव के बीच आगे बढ़ रहा है। लोग खुले मंच पर आने से डरते हैं, लेकिन धीरे-धीरे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी भागीदारी बढ़ रही है।
ईरान में Ex-Muslim Movement
ईरान में यह आंदोलन ज्यादा आक्रामक और सार्वजनिक रूप में दिखाई देता है। महिलाएं और युवा इस्लामी शासन के खिलाफ सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज करा रहे हैं।
एक करोड़ से अधिक एक्स-मुस्लिम होने का दावा
हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित आर्य समाज के एक कार्यक्रम में एक्स-मुस्लिम इमरोज आलम ने मंच से अपना नाम राजन चौधरी रखने की घोषणा की। उनके जैसे कई अन्य एक्स-मुस्लिमों का दावा है कि देशभर में हाल के वर्षों में उनकी संख्या एक करोड़ से अधिक हो चुकी है, हालांकि इस दावे का कोई ठोस सांख्यिकीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
फिर भी, इस मुहिम से जुड़े लोग मानते हैं कि लगभग 25 वर्ष पहले केरल से शुरू हुआ यह आंदोलन अब उत्तर भारत तक फैल चुका है। उनके अनुसार, धीरे-धीरे ऐसे लोग सामने आ रहे हैं जो व्यक्तिगत रूप से या परिवार सहित मुस्लिम धर्म छोड़ रहे हैं।
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परिवार सहित धर्म परिवर्तन के उदाहरण
पंजाब के चंडीगढ़ निवासी जावेद इकबाल ने कुछ माह पहले हिंदू धर्म अपनाकर अपना नाम जीतेंद्र गौड़ रख लिया। उन्होंने अपनी पत्नी और दो किशोर बच्चों के साथ सनातन धर्म ग्रहण किया। उनका कहना है कि भले ही उनके पूर्वजों ने किसी दबाव में धर्म बदला हो, लेकिन उनकी सांस्कृतिक जड़ें मूल परंपरा से ही जुड़ी रही हैं।
धर्म परिवर्तन से पहले उन्होंने वर्षों तक दोनों धर्मों का अध्ययन किया। कट्टरता, महिलाओं की स्थिति, रूढ़िवादिता, ठहराव और प्रश्न पूछने की सीमाओं जैसे मुद्दों के आधार पर उन्होंने हिंदू धर्म को अधिक स्वीकार्य पाया। हालांकि यह निर्णय आसान नहीं था। देवबंद से ताल्लुक रखने वाली उनकी पत्नी को समझाने में समय लगा, जबकि उनकी 16 वर्षीय बेटी और 11 वर्षीय बेटे ने इसे सहज रूप से स्वीकार किया।
केरल से शुरू हुई मुहिम
केरल में एक्स-मुस्लिम आंदोलन से जुड़े बेयान इब्राहिम का कहना है कि ईरान और भारत में मुस्लिम समाज के भीतर चल रहे असंतोष में कई समानताएं हैं। दोनों ही स्थानों पर इस्लामिक रूढ़िवादिता के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। उनका मानना है कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में एक्स-मुस्लिमों को अपेक्षाकृत सकारात्मक माहौल मिला है। हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि अभी इस वर्ग के लिए स्पष्ट कानूनी और सामाजिक संरक्षण की आवश्यकता है।
वे मदरसों की बजाय आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को आवश्यक मानते हैं और बताते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा दिलाई है। इस पूरी प्रक्रिया में विश्व हिंदू परिषद और आर्य समाज जैसे संगठनों ने सहयोगी भूमिका निभाई है।
सामाजिक चुनौतियां अब भी मौजूद
सनातन धर्म अपनाने के बाद भी कठिनाइयां कम नहीं होतीं। इमरोज आलम बताते हैं कि कई बार पूर्व में मुस्लिम होने के कारण हिंदू मकान मालिक उन्हें किराये पर घर देने में हिचकिचाते हैं। इसके अलावा बच्चों के भविष्य और विवाह को लेकर भी चिंता बनी रहती है।
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती का कहना है कि जैसे-जैसे ऐसे लोगों की संख्या बढ़ेगी, सामाजिक स्वीकार्यता भी बढ़ेगी और आपसी विवाह के रास्ते खुलेंगे। उनका मानना है कि समय के साथ ये समस्याएं स्वतः कम होंगी।
Ex-Muslim Movement से जुड़ी चुनौतियां
इस आंदोलन से जुड़े लोगों को सामाजिक बहिष्कार, आवास और विवाह जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि, संख्या बढ़ने के साथ सामाजिक स्वीकार्यता भी बढ़ रही है।
कुल मिलाकर, Ex-Muslim Movement भारत और ईरान दोनों देशों में सामाजिक और धार्मिक विमर्श को नई दिशा दे रहा है। आने वाले समय में यह आंदोलन और अधिक प्रभावी रूप ले सकता है।